Similar Posts

  • Aptantrak(Hysteria)Gutika

    Post Views: 435  अपतन्त्रकारि बटी (हिस्टीरियाहर बटी)            गुण और उपयोग (Uses and Benefits )– अपतन्त्रकारि (हिस्टीरियाहर) बटी का प्रभाव वातवाहिनी नाड़ी और मस्तिष्क पर विशेष होता है।अपतन्त्रक (हिस्टीरिया)-आयुर्वेदीय मतानुसार रूक्षादि कारणों से प्रकूपित वायु अपने स्थान को छोड़ कर हृदय में जा कर पीड़ा उत्पन्न करता है। इसमें मस्तक और…

  • Amlakiadi Avleh

    Post Views: 311 आमलक्याद्यवलेह गुण और उपयोग (Uses and Benefits)  :- इसका उपयोग पाण्डु और कामला रोग में विशेष किया जाता है। पाण्डु रोग में यह बहुत ही लाभ करता है। इसमें आमले का स्वरस विशेष होने से यह रक्त कणों की “वृद्धि कर पांडु रोग नष्ट करता है। रक्तपित्त, पित्तविकार, अम्लपित्त, अन्तर्दाह, बाह्यदाह, प्यास…

  • Grahenikapat Ras

    Post Views: 30 ग्रहणीकपाट रस मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि  ( Main Ingredients and Method of Preparation) –  शुद्ध पारा 2 तोला, शुद्ध गन्धक 10 तोला, शुद्ध अफीम 4 तोला, कौड्डी भस्म 7 तोला, शुद्ध बच्छनाग विष 1 तोला, कालीमिर्च 8 तोला और शुद्ध धतूरे का बीज 20 तोला लें। प्रथम पारा-गन्धक की कज्जली करें, फिर सब…

  • Chandrodye Ras

    Post Views: 24 चन्द्रोदय रस ( रसगन्धकवडङ्गाश्रकल्प ) मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि  ( Main Ingredients and Method of Preparation) –  शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, बंग भस्म, अभ्रक भस्म–प्रत्येक समान भाग लेकर प्रथम पारा- गन्धक की कज्जली बनावे, फिर उसमें बंग भस्म और अभ्रक भस्म मिलाकर जम्बीरी नींबू के रस में घोंट, गोला बना, सम्पुट में बन्द…

  • Murachantak Ras

    Post Views: 16 मूर्च्छान्तक रस मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि  ( Main Ingredients and Method of Preparation) –  रससिन्दूर, स्वर्णमाक्षिक भस्म, स्वर्ण भस्म, शुद्ध शिलाजीत, लौह भस्म–प्रत्येक 1-1 भाग लेकर सबको एकत्र मिला करके शतावरी और विदारीकन्द के स्वरस या क्वाथ में 1-1 भावना देकर दृढ़ मर्दन करें। गोली बनाने योग्य होने पर 1-1 रत्ती की गोली…

  • Rohitak Loh

    Post Views: 342 रोहितक लौह गुण और उपयोग (Uses and Benefits)  :- यकृत्‌ और प्लीहा की वृद्धि, शोथ, पाण्डु रोग और पुराने विषमज्वर में लाभदायक है। यकृत्‌ और प्लीहा की वृद्धि होने पर मन्दाग्नि, भूख न लगना, जाड़ा देकर बुखार आना, ‘रस-रक्तादि धातुओं की कमी के कारण शरीर दुर्बल और कान्तिहीन हो जाना, कभी-कभी शोथ…