Kamdhenu Ras
कामधेनु रस
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation) – शुद्ध गन्धक और आँवला-कली चूर्ण इन दोनों को समान भाग लेकर आँवला-रस और सेमल मूसली के रस की 7-7 भावना देकर छाया में सुखा कर रख लें। — भै. र.
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan)– 2-4 रत्ती, सुबह-शाम धारोष्ण दूध, मधु अथवा न्यूनाधिक मात्रा में घी और मधु मिलाकर दें, ऊपर से दूध पिला दें।
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :-
- यह बल-वीर्य-वरद्धक, कामोद्दीपक तथा पौष्टिक रसायन है, इसके सेवन से प्रमेह, विशेषकर शुक्रमेह, ध्वजभंग आदि नष्ट होकर शरीर में कामशक्ति अधिक मात्रा में उत्पन्न होती है।
- वीर्य की कमी से उत्पन्न नपुंसकता, इन्द्रिय की शिथिलता, सुस्ती आदि इससे बहुत जल्दी ठीक हो जाती हैं।
- यह रस-रक्तादि धातुओं. को शुद्ध करके बढ़ाता तथा नवयौवन प्रदान करता है।
- पाचन-क्रिया. में जब विकृति उत्पन्न हो जाती है, अर्थात् पाचक-पित्त की निर्बलता के कारण भोजन किए हुए पदार्थ का ठीक-ठीक पचन नहीं होने से रस-रक्तादि धातु अच्छी तरह नहीं बन पाती हैं, जिससे रस-रक््तादि धातुओं का क्रमशः क्षय होकर शरीर कमजोर होने लगता है। फिर अनेक उपद्रव खड़े हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में कामधेनु रस का प्रयोग किया जाता है।
- जीर्णज्चर में आयुर्वेद में लिखा है कि ‘त्रिसप्ताहव्यतीते तु जीर्ण-ज्वरः प्रोच्यते बुधैः’ अर्थात् 21 दिन के बाद ज्वर, जीर्णता में परिणत हो जाता है। इसमें मन्दाग्नि होने से पाचन-क्रिया ठीक-ठीक नहीं होती है। अतएव, शरीर में रक्तकणों की कमी हो जाने से रक्त का क्षय हो जाता है। रकतकणों की कमी के कारण शरीर कान्तिहीन हो जाता है तथा ज्वर, प्यास, जलन, चक्कर आना, मन में बेचैनी, नाड़ी की गति में वृद्धि इत्यादि लक्षण होते हैं। ऐसी अवस्था में कामधेनु रस का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।
- विषम ज्वर की तीव्र अवस्था में कामधेनु रस का प्रयोग नहीं किया जाता। किन्तु जब विषम ज्वर पुराना हो जाता है, तब ज्वर का विष रक्तादि धातुओं को दूषित करता है, ऐसी अवस्था में कामधेनु रस का प्रयोग करने से रस-रक्तादि धातुओं का शोधन होकर अच्छा फायदा होता है।
- पैत्तिक प्रमेह में
- बराबर ज्यादे मात्रा में पीतवर्ण का पेशाब होना, प्यास ज्यादा लगना, सम्पूर्ण शरीर में जलन, पसीना ज्यादा निकलना आदि लक्षण होने पर -कामधेनु रस, प्रवाल चन्द्रपुरी तथा गिलोय सत्त्व के साथ मिलाकर देने से लाभ करता है।
- अम्लपित्त रोग में आमाशय की विकृति के कारण अत्न का एचन ठीक से न होकर आमाशय में ही अन्न अधिक काल तक पड़ा रहना, जिससे पेट में भारीपन, जी मिचलाना, मुँह का स्वाद नष्ट हो जाना, खाया हुआ अन्न कुछ समय में जलयुक्त दुर्गन्धमय होकर वमन के द्वारा बाहर निकल जाना, खट्टी डकारें आना–प्रभूति लक्षण होते हैं तथा अम्लपित्त की असाध्यावस्था में पानी तक नहीं पचता है। पानी पीने के बाद तुरन्त वमन हो जाता है। ऐसी अवस्था में कामधेनु रस देने से आमाशय में रहने वाला पित्त जागृत होकर पाचन क्रिया को सुधार देता है, जिससे अन्नादिक पचने में बाधा नहीं होती है तथा इसके शामक प्रभाव के कारण विदग्ध पित्त की अम्लता के कारण होने वाले वमन, खड्टी डकारे, अरुचि, जी मिचलाना आदि लक्षण भी शमित हो जाते हैं।
This content is for informational purposes only. Always consult a certified medical professional before using any medicines.
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