Sarvangsundar Ras
सर्वांगसुन्दर रस
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation): – शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक समान भाग लेकर कज्जली बना, पर्पटी-विधान से बनाई हुई पर्पटी 2 तोला लें। फिर जायफल, जावित्री, लौंग, निम्बपत्र, निर्गुण्डी के पत्ते और छोटी इलायची के दाने 1-1 तोला लेकर चूर्ण बना लें। पर्पटी को खूब महीन पीसकर काष्ठौषधियों का कपड़छन किया हुआ महीन चूर्ण मिला, पानी के साथ बारह घण्टे तक खरल कर, गोला बना, मोतीसीप (मुक्ताशुक्ति) में बन्द कर कपड़मिट्टी करके लघुपुट में रख दें। स्वांग-शीतल होने पर सम्पुट निकाल मिट्टी ऊपर से हटाकर दवा निकाल, खरल में महीन पीसकर सुरक्षित रख लें।
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan) :- 1 से 2 रत्ती सुबह-शाम। बच्चों को इसकी चौथाई मात्र में दें। बच्चों के लिये माता का दूध या मधु के साथ देना अच्छा हैं। रक्तस्राव-सम्बन्धी विकारों में वासा रस और मधु के साथ, अतिसार और संग्रहणी में सोंठ चूर्ण और मधु के साथ दें। रक्तप्रदर में मौलसरी की छाल या अशोक-छाल के क्वाथ के साथ देने से यह बहुत शीघ्र रक्त को बन्द कर देता है।
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :-
- यह रसायन अग्निदीपक, बलवर्द्धक और बालकों का परम हितकारी है।
- बालग्रह ज्वर, अतिसार, दूषित दूध के विकार आदि सभी बाल रोगों में यह बहुत अच्छा काम करता है।
- बच्चों के हरे-पीले दस्त, अपच, संग्रहणी, वमन और शोष रोगों में इसका मिश्रण बहुत उपकारक है।
- बच्चों की तरह स्त्री-पुरुषों के अतिसार, ज्वरातिसार, आमानुबन्ध, संग्रहणी और उसके उपद्रव इससे ठीक हो जाते हैं।
- पित्तातिसार, प्रदाह, अम्लपित्त, रक्तप्रदर, शिरोभ्रम, अंशुघात, नेत्रदाह, प्रवाहिका तथा रक्त-स्त्रावसम्बन्धी रोगों में इसका प्रयोग किया जाता हैं।
- प्रसूतातिसार और प्रसूता की संग्रहणी में भी इससे बहुत लाभ होता है।
- यह रसायन वात-कफ शामक और रक्त-निरोधक है।
- कफप्रधान रोगों में इसके प्रयोग सेबहुत लाभ होता है।
- आयुर्वेद के मतानुसार बच्चों में कफ की वृद्धि होने से उसकी प्रकृति भी कफात्मक होती है, अतएव कफ-सम्बन्धी रोग बच्चों को अक्सर हो जाया करते हैं।
- कभी-कभी कफ बढ़ जाने के कारण बच्चों को पतले दस्त होने लगते हैं। दस्त पतले, सफेद रंग के और फटे हुए से बार-बार होना, वमन होना, पेशाब ज्यादा और सफेद होना आदि उपद्रव उत्पन्न होने पर सर्वांगसुन्दर रस से बहुत फायदा होता है। इससे बढ़ा हुआ कफ दस्त के रास्ते निकल जाता है और आंतों की विकृति दूर होकर, आँत निर्दोष और सबल हो जाती है, जिससे दस्त भी गाढ़े होने लगते हैं और फिर धीरे-धीरे कमजोरी दूर हो, बच्चा स्वस्थ हो जाता है।
- ज्वरातिसार के प्रारम्भ में हरे-पीले रंग के दस्त होने के साथ-साथ ज्वर भी होने लगता है और धीरे-धीरे यह ज्वर 102-103 डिग्री तक पहुँच जाता है। इससे प्यास ज्यादा लगना, बेचैनी तथा वमन आदि उपद्रव उत्पन्न होते हैं। रोग की उग्रावस्था में दूध भी नहीं पचता, ज्वर की गर्मी के मारे बच्चा ठण्डा जल पीने या पृथ्वी पर सोने की इच्छा करता है। ऐसे समय में दूध बन्द कर मौसम्बी, अनार या अंगूर के रस या ग्लूकोज पानी में डालकर अथवा बकरी के दूध में मिलाकर देने से अच्छा लाभ होता है। बार्ली भी दे सकते हैं। साथ-साथ सर्वांगसुंदर रस भी शंख भस्म के साथ थोड़ी-थोड़ी मात्रा में देते रहें, तो बहुत शीघ्र लाभ होता है।
- संग्रहणी की पुरानी अवस्था में मल के साथ रक्त भी जाता हो और आँव का अंश कम हो, आँतों में दर्द व मरोड़ उठती हो, दस्त बार-बार होते हों, ऐसी हालत में सर्वांगसुन्दर रस, शर्वत अनार या कुटजावलेह में मिलाकर देने से अवश्य फायदा होता है।
- अतिसार होने पर यदि समुचित चिकित्सा नहीं हुई तो यह रोग प्रवाहिका के रूप में बदल जाता है। इसमें दस्त बहुत और अनेक बार होते हैं। आंतों की कमजोरी एवं गुदावलियों की शिथिलता से दस्त नहीं रुकता, वेग आने पर तुरन्त बाहर निकल आता है, जिससे कपड़े भी खराब हो जाते हैं। इसकी उग्रावस्था में कांच भी निकलने लगती है। ऐसी अवस्था में आंतों को सबल बनाने तथा जठराग्नि प्रदीप्त करने और दस्त को बाँधने के लिये सर्वांगसुन्दर रस का उपयोग किया जाता हैं। भाँग की पोटली बना कडुए तेल में डुबोकर पोटली को जरा गर्म कर गुदमार्ग को सकने से काँच निकलना बन्द हो जाती है।
- बच्चों के पारिगर्भिक रोग में: आयुर्वेद-शास्र के मतानुसार गर्भवती माता का दूध पीने से बच्चे को यह रोग होता है क्योंकि यह दूध भारी होने की वजह से गुरुपाकी होता है, जिसे छोटे बच्चे हजम नहीं कर सकते। परिणाम यह होता हैं कि दूध पेट में ज्यों का त्यों पड़ा रहता है, इसमें पेट बढ़ जाता है और हाथ-पाँव सूखकर पेट आगे निकल आता है। आँखें सफेद हो जातीं, भूख नहीं लगती, पतले दस्त होते, ज्वर भी होता है। खाने की इच्छा न होते हुए भी खाने के लिए रोते रहना, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाना, कान्तिहीनता आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में सर्वांगसुन्दर रस प्रवालचन्द्रपुटी के साथ देने से बहुत लाभ होता है। माता का दुध बन्द कर देना हितकर है।
- रक्तप्रदर यदि किसी दवा से अच्छा होता हुआ न दिखे तो मौलसरी की छाल का चूर्ण 3 माशा के साथ सर्वांगसुन्दर रस देने से 2-4 रोज में ही आश्चर्यजनक लाभ करता है। यह कई बार का परीक्षित है।
This content is for informational purposes only. Always consult a certified medical professional before using any medicines.
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