Pipliadi Loh
पिप्पल्यादि लौह
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :-
- यह कास, श्वास, हिचकी, वमन आदि रोगों को दूर करने के लिए अत्युत्तम दवा है।
- छाती में कफ जमा हॉकर बैठ जाने से बहुत खाँसने पर थोड़ा-सा कफ निकलता है, जिससे रोगी को बड़ी परेशानी होती है। ऐसी हालत में इसकी 2-3 मात्रा देने से शीघ्र लाभ होता है।
- यह दवा पित्त-प्रधान रोगों में विशेष उपयोग और गुण-दायक है! प्रकुपित वात या पित्त- कफ को सुखाकर छाती में बैठा (जमा) देता है, जिससे सूखी खाँसी आने लगती है। इसमें खाँसी का वग थोड़ी-थोड़ी देर बाद आता है। किन्तु जब आता हें तब अधिक देर तक रहता है।
- खाँसते-खाँसते आंखें सुखं (लाल) हो जाती हैं, चेहरा तमतमा जाता है, सांस फूलने लगती हें, प्यास की अधिकता, शीतल पदार्थ खाने की विशेष इच्छा आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। ऐसी परिस्थिति में पिपल्यादि लौह को प्रवाल चन्द्रपुटी तथा अडूसा क्षार में मिला कर दने से बहुत शीघ्र लाभ होता है। इसमे कफ पिघल कर खाँसी के साथ निकलने लग जाता है, साथ ही पित्त भी शान्त हो जाता हैं। लगानार कुछ दिनों तक सेवन करने स खाँसी जड़ से चली जाती हैं।
- हिचकी और वमन में तथा प्यास की अधिकता में भी इसके सेवम सें बड़ा उत्तम लाभ होता है।
- श्वास रोग में शुद्ध टंकण के साथ मधु में मिलाकर देने से श्रेष्ठ गुणकारी है
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan) :- 1-1 गोली दिन में 2-3 बार शहद और बहेड़ा की मांगी के चूर्ण के साथ दें।
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation): – छोटी पीपल, आँवला, मुनक्का, बेर की गुठली की गिरी, शहद, मिश्री, वायविडंग, पोहकरमूल–प्रत्येक ।-१ भाग तथा लौह भस्म इन सब दवाओं के समान (8 तोला) लेकर काष्ठौधियों का कपड़छन चूर्ण बना, सबको एकत्र मिला कर रखें या जल से घोंटकर 3-3 रत्ती की गोलियाँ बना, सुखाकर रख लें। भै. र.
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