Mrigank Ras
मृगांक रस
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation) – शुद्ध पारा 1 तोला, शुद्ध गन्धक 2 तोला, मोती भस्म या षिष्टी 2 तोला, सुवर्ण भस्म 1 तोला, सुहागे की खील 3 माशे–इन सब चीजों को काँजी में घोंटकर गोला बना, सुखा, मुषा में बन्द करके एक घड़े में आधे भाग में नमक नीचे रख उसमें मूषा रख कर, ऊपर से आधा बचा हुआ नमक डाल दें। इस घड़े को चार प्रहर आग पर रख कर पकावें। स्वांग-शीतल होने पर घड़े में से मूषा निकाल, खोल कर दवा निकाल कर रख लें।
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan)– 1 से 2 रत्ती सुबह-शाम, 10 पीपल अथवा 10 काली-मिर्च का चूर्ण और शहद के साथ दें।
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :
- यह राजयक्ष्मा के लिए बहुत प्रसिद्ध दवा है।
- इसके सेवन से पुराना ज्वर, पुरानी खाँसी श्वास और हृदय के रोगों में बहुत लाभ होता है।
- यह फुफ्फुस और श्वास-यन्त्रों की खराबी दूर कर उसकी क्रिया को ठीक करता है।
- क्षय के कीटाणु इसके सेवन से नष्ट होते हैं, तथा फेफड़े और हृदय को बल मिलता है।
- विशेष गुण-धर्म–यह रसायन राजयक्ष्मा की बहुत प्रसिद्ध औषध है।
- इसके प्रयोग से जीर्ण ज्वर, पुरानी खाँसी, श्वास और हृदय के रोगों में बहुत लाभ होता है तथा फुफ्फुस और श्वास-यन्त्रों की विकृति को नष्ट कर उनकी क्रिया को ठीक करता है।
- क्षयोत्पादक कीटाणुओं को नष्ट करने की यह परमौषधि है।
- हृदय और फुफ्फुस को इससे उत्तम बल मिलता हैं।
- इसका प्रयोग शुष्क कास और कफोत्त्ति नष्ट हो जाने के बाद करना विशेष उपयोगी है।
- क्षय रोग की प्रथमावस्था में शुष्क कास हो जाती हैं। इस समय फुफ्फुसों की श्लैष्मिककला को स्निग्ध बनाने तथा कीटाणुओं की ग्रन्थियों को नष्ट करने के लिए प्रवाल पिष्टी और सितोपलादि चूर्ण के साथ बहुत कम मात्रा में मृगांक रस का विषम भाग शहद और घृत के साथ सेवन करना हितकारी है।
- द्वितीयावस्था में कफ गाढ़ा, श्वेत और पीला हो जाता हैं। उस दशा में कफ को बाहर निकालने एवं कीटाणुओं की वृद्धि को रोकने के लिए तथा विष को नष्ट कर फुफ्फुसों को निर्दोष बनाने के लिए अभ्रक भस्म और शृंग भस्म के साथ मृगांक रस के प्रयोग से अच्छा लाभ होता है। इसके साथ अनुपान रूप में कासकण्डनावलेह का प्रयोग करना भी विशेष उपयोगी है। कफ के साथ रक्त आने की अवस्था में अनुपान रूप में वासावलेह का प्रयोग करना भी विशेष लाभदायक है।
- तृतीयावस्था में फुफ्फुसों में बड़े-बड़े कोटर (गड्ढे) हो जाते हैं। कफ हरे-पीले वर्ण का दुर्गन्ध युक्त और गाँठदार निकलता है। ऐसी दशा में अभ्रक भस्म, शृंग भस्म और वासावलेह के साथ मिलाकर मृगांक रस का सेवन करना लाभकारी है। अन्य कोई लक्षण उपस्थित होने पर उस लक्षण के अनुसार चिकित्सा करनी चाहिए।
- इसके अतिरिक्त धातु क्षीणता, जीर्ण ज्वरजन्य निर्बलता, संग्रहणी, कास, श्वास, कुष्ठ, पाण्डु आदि रोगों से उत्पन्न निर्बलता नष्ट करने के लिए काली मिर्च-चूर्ण 2 रत्ती अथवा चौंसठप्रहरी पीपल 2 रत्ती और मधु के साथ या रोगानुसार अनुपान के साथ इस रस का प्रयोग किया जाता है।
This content is for informational purposes only. Always consult a certified medical professional before using any medicines.
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