Jalodarari Ras (Second)
जलोदरारि रस ( दूसरा )
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation) – पीपल, ताम्र भस्म और हल्दी का चूर्ण 1 – 1 भाग तथा दृध शुद्ध जमालगोटे के बीज सब के बराबर लेकर सब को एक दिन थूहर (सेंहुड़) के दूध में घोंट कर – रत्ती की गोलियाँ बना, सुखा कर रख लें। र. का. धे
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan)– 1 से 2 गोली गर्म जल से दें।
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :
- यह रसायन उपरोक्त से तीव्र विरेचक हैं।
- इसकी एक गोली लेने से ही अत्यन्त पतले दस्त होने लगते हैं, जिससे जलोदर कम हो जाता है।
- शरीर अत्यन्त दुर्बल होना, हृदय में दर्द, पतले दस्त होना, पेट फूला रहना, पाण्डुता, आँखें पीली या नीली-सी हो जाना, सर्वांग शोथ होना, इन लक्षणों से जलोदर हो जाने की आशंका हो जाती है, या जलोदर हो ही जाता है। ऐसी अवस्था में पेट में संचित जल तथा सर्वांग शोथ दूर करने के लिये इस रस का प्रयोग करना अच्छा है।
- पहले यकृत् व प्लीहा की वृद्धि हो जलोदर उत्पन्न हो जाता है, और वह जलोदर कफ प्रधान हो तो इसमें निम्न लक्षण होते हें-पेट में भारीपन, सर्वांग जड़ता, पेशाब हो किन्तु सफेद और चिकना, मलावरोध, सूजन विशेषकर पांवों में-आदि लक्षण होने पर जलोदरारि रस का सेवन करना चाहिए। इससे (दस्त) जुलाब होकर सूजन कम हो जाती तथा जल निकल जाने से पेट भी छोटा हो जाता है।
- इस रसायन में पिप्पली कटुरसात्मक, पाचक और सूक्ष्म स्रोतोऽनुगामी है।
- ताम्र तीव्र, पाचक, यकृत, पित्त्स्राव कारक और यकृत् तथा प्लीहा वृद्धि को कम करता है।
- हल्दी–रक्त-प्रसाधक, हृदय को प्रसन्न करने वाली और कुछ स्तम्भक है।
- सेंहुड–शोथहर, तीव्र-रेचक, तीक्ष्ण, उष्ण और व्यवायी है।
- जयपाल–तीव्र रेचक होने से दूषित मलों और जल के संचय को शरीर से बाहर निकाल कर उत्तम संशोधन एवं रोग का शमन करता है। –औ. गु. ध. शा
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