Sirahshooladi Vajar Ras
शिरःशूलादिवज्र रस
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation): – शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लौह भस्म, ताम्र भस्म–प्रत्येक 4-4 तोले, शुद्ध गुग्गुलु 16 तोले, त्रिफला चूर्ण 8 तोले तथा कूठ, मुलेठी, गोखरू, वायविडंग और दशमूल–प्रत्येक 1-1 तोला लें। प्रथम पारा-गन्धक को कज्जली बना लें, फिर उसमें अन्य औषधियों का चूर्ण मिलाकर दशमूल क्वाथ में घोंटें और हाथ में घी लगाकर 4-4 रत्ती की गोलियाँ बना, छाया में सुखाकर रख लें।
वक्तव्य; दशमूल के प्रत्येक प्राप्य द्रव्य की एक-एक तोला डालना चाहिए।
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan) :- 1 से 2 गोली सुबह-शाम। 1 माशा गोदन्ती हरिताल भस्म और मिश्री मिलाकर बकरी या गाय के दूध के साथ अथवा जल के साथ दें।
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :
- इस रसायन के सेवन से वातज-पित्तज और कफज सब प्रकार के सिर-दर्द नष्ट होते हैं।
- सिर-दर्द: स्वतन्त्र अथवा किसी रोग के उपद्रव रूप से दो तरह के होते हैं।
- स्वतन्त्र रूप से आयुर्वेद में 11 प्रकार के सिर-दर्द बताए गए हैं। यथा–वात, पित्त, कफ, सन्निपात और रक्त के प्रकोप से, क्षय व कृमि से, सूर्यावर्त, अनन्तवात, अर्धावभेदक, शंखक इस तरह सब 11 है।
- इसके अतिरिक्त प्रायः देखा जाता है कि कोई भी रोग क्यों न हो सिर-दर्द उसमें होता ही है-ऐसा क्यों होता है? सम्पूर्ण शरीर का केन्द्रस्थान सिर है, यहीं से शरीर-रूपी दुनिया का संचालन होता है। अतएव, शरीर के किसी भी अवयव में तकलीफ होते ही उसका असर प्रथम मस्तिष्क पर पड़ता है। अतः जब तक वह अङ्ग स्वस्थ नहीं हो जाता, सिर-दर्द होता रहता है।
- कभी-कभी ऐसा भी होता है कि रात में विशेष जागरण, अधिक परिश्रम, मानसिक चिन्ता, जुकाम आदि कारणों से भी सिर-दर्द होने लगता है, क्योंकि उक्त सब कारण वातप्रकोपक हैं। अतः इन कारणों से वात-प्रकुपित हो, सिर में दर्द होने लगता है, किन्तु इसमें दवा की उतनी आवश्यकता नहीं होती। ये दर्द तो प्राय: उपचार मात्र से ही ठीक हो जाते हैं, इसमें वात-शमन करने वाला उपचार करना पड़ता है। इनमें यदि शिरःशूलादिवज्र रस का उपयोग किया जाय, तो बहुत सफलता मिल सकती है, क्योंकि इस रसायन में गुग्गुलु की मात्रा विशेष होने से इसका प्रभाव वात और रक्तवाहिनी नाड़ियों पर विशेष होता है। गुग्गुलु वात-प्रशमन के लिए प्रसिद्ध है और दर्द बिना वात के होता नहीं। अतएव यह रसायन हर प्रकार के सिर-दर्द में फायदा करता है।
- अर्द्धावभेदक (धूबा या अर्द्धकपाली), सूर्यावर्त (प्रातःकाल सूर्योदय से दोपहर तक बढ़नेवाला सिर-दर्द) में गोदन्ती भस्म के साथ मिला पथ्यादि क्वाथ के साथ कुछ समय तक सेवन करने से रोग जड़ से मिट जाता है। कितने ही रोगियों पर प्रयोग करके हमने इसे उत्तम लाभजनक अनुभव किया है।
- मस्तिष्क की कमजोरी के कारण होने वाले सिर-दर्द में इसके सेवन के साथ-साथ बादाम और मिश्री को मक्खन में मिलाकर या साथ करने से बहुत उत्तम एवं स्थायी लाभ होता है। इसके सेवन से दिमाग पुष्ट हो जाता है।
This content is for informational purposes only. Always consult a certified medical professional before using any medicines.
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