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  • Agasti Sootraj Ras

    Post Views: 50 अगस्ति सूतराज रस मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि  ( Main Ingredients and Method of Preparation) – शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध हिंगुल 1-1 तोला, शुद्ध धतूरे के बीज 2 तोला तथा शुद्ध अफीम-2 तोला। प्रथम पारा गन्धक की कज्जली बना फिर अन्य दवाओं का महीन चूर्ण कर सबको मिलाकर भांगरे के रस में घोंटें।…

  • Chitrak Haritiki

    Post Views: 594 चित्रक हरीतकी गुण और उपयोग (Uses and Benefits)  :- पुराने और बारम्बार होनेवाले प्रतिश्याय (जुखाम) में इसके सेवन से अच्छा लाभ होता है। खाँसी, पीनस, कृमि रोग, गुल्म, उदावर्त, अर्श, श्वास, मन्दाग्नि में भी यह श्रेष्ठ लाभ करती है। आचार्य यादवजी कहते हैं “इसके सेवन-काल में नाक में दिन में दो बार…

  • Vidhyadhar Abhar Ras

    Post Views: 16 विद्याधराभ्र रस मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि  ( Main Ingredients and Method of Preparation) –  शुद्ध पारद 9 माशे, शुद्ध गन्धक 1 तोला, लौह या मण्डूर भस्म 16 तोला, अभ्रक भस्म 4 तोला, वायविडंग, नागरमोथा, हरे, बहेड़ा, आँवला गिलोय, दन्दी मूल, निशोथ, चित्रक, सोंठ, मिर्च और पीपल–प्रत्येक 1-1 तोला लें। प्रथम मंडूकपर्णी के रस…

  • Kumar Kalyan Ras

    Post Views: 48 कुमारकल्याण रस मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि  ( Main Ingredients and Method of Preparation) –  रससिन्दूर, मोती भस्म, स्वर्ण भस्म, अभ्रक भस्म, लौह, भस्म और सोनामक्खी भस्म बराबर-बराबर लेकर घीकुमारी के रस में घोंट कर मूँग के समान गोलियाँ बना लें। वक्तव्य : मूँग स्थान भेद से छोटे-बड़े होते हैं। अतः आधी-आधी रत्ती वजन…

  • Shrikhandasava

    Post Views: 174 श्रीखंडासव गुण और उपयोग (Uses and Benefits)  : इसके सेवन से मद्यजनित रोग यथा–पानात्यय, पानविभ्रम, पानाजीर्ण आदि रोग दूर होते हैं। पैत्तिक (पित्तजन्य) रोगों में इसका विशेष उपयोग किया जाता है। रक्तपित्त, प्यास कीं अधिकता, बाह्यदाह और अन्तर्दाह, रक्तदोष, मूत्रकृच्छू, मूत्राघात, शुक्रदोष आदि विकारों में भी यह उत्तम लाभदायक है। मात्रा और अनुपान …