Smritisagar Ras
स्मृतिसागर रस
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation): – शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध हरताल, शुद्ध मैनशिल, स्वर्णमाक्षिक भस्म और ताम्र भस्म–ये सब समान भाग लेकर प्रथम पारा-गन्धक की कज्जली बनावें। फिर उसमें अन्य औषधियाँ मिलाकर बच के क्वाथ की 21 भावना और ब्राह्मी क्वाथ की 21 भावना देकर सुखा लें। फिर मालकांगनी तैल की 1 भावना देकर 1-1 स्ती की गोलियाँ बना, सुरक्षित रख लें।
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan) :- 1-1 गोली सुबह-शाम घी के साथ दें, अथवा गरम दूध में ब्राह्मी घृत मिलाकर उसके साथ दें।
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :-
- यह रसायन स्मरण-शक्ति बढ़ाने के लिये परमोपयोगी है।
- इसके सेवन से स्नायविक दुर्बलता मिटती है।
- मस्तिष्क की कमजोरी से पैदा होने वाले रोग-मूर्च्छा, उन्माद, मृगी, हिस्टीरिया आदि में इसका प्रयोग करना बड़ा लाभदायक है।
- ज्ञानवाहिनी नाड़ियों को इसके सेवन से बल और चेतना प्राप्त होती है।
- इस रसायन का विशेष उपयोग मानसिक रोगों में होता है।
- मनोविभ्रम के कारण होने वाले उन्माद रोग में यह बहुत काम करता है।
- यह रोग मानसिक चिन्ता, दुख, शोक, भय, कार्य में दिन-रात लिप्त रहने, गाँजा, भाँग, शराब आदि का अधिक व्यवहार करने, अति स्त्री-प्रसंग, माथे में चोट लगने तथा पुराने आतशक आदि कारणों से उत्पन्न होता है। इन कारणों में प्रधान कारण मानसिक -विकृति या ज्ञानवाहिनी नाड़ी की शिथिलता (कमजोरी) है। पित्त की वृद्धि हो रक्त में एकाएक गर्मी बढ़ जाती है फिर यह गर्मी मस्तिष्क की ओर जाकर वहाँ की नाड़ियों को कमजोर बना देती है, जिससे दिमाग ठीक-ठीक काम नहीं करता, भूल पर भूल होना, जरूरी काम भी भूल जाना, पित्त अस्थिर (चंचल), चंचलता के कारण किसी काम में मन न लगना, आलस्य, नींद न आना, भूख कम लगना, विशेष चिन्ता–ये लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। किसी-किसी मनुष्य की प्रकृति ही ऐसी होती है कि वह किसी की भी बात नहीं सुनता, असहनशीलता बहुत बढ़ जाती है। रोग मानसिक और शारीरिक दोष के भेद से दो प्रकार के होते हैं। दोषात्मक के अनेक लक्षण शास्त्र में वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त देव और पितृगृह सम्बन्धी भी होते हैं। कोमल प्रकृति वालों को यह रोग शीघ्र हो जाता है। इसलिये स्त्रियाँ इस रोग से शीघ्र ही आक्रान्त हो जाती हैं।
- हिस्टीरिया (गर्भाशयोन्माद)–यह रोग जवान लड़कियों को उनकी संभोग-इच्छा की तृप्ति नहीं होने पर अधिकतर होता है। बड़ी आयु वाली स्त्रियों को प्रायः यह रोग कम होता है। इनमें भी जो लड़कियाँ अधिक चंचल, ज्यादे गुस्से वाली तथा सहनशक्ति की कमी वाली हों उन पर इस रोग का बहुत शीघ्र प्रभाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त अधिक चिन्ता, शोक, भय, पारिवारिक कष्ट, आकस्मिक मानसिक आघात, प्रसूत रोग, मासिक धर्म की गड़बड़ी आदि कारणों से भी होता हैं। कभी-कभी पति से विद्वेष होने के कारण भी यह रोग उत्पन्न होते देखा गया है।
- हिस्टीरिया रोग का दिमाग से घनिष्ठ सम्बन्ध है। दिमाग अधिक परेशान होने पर रोग विशेष रूप से प्रकट होता है। यदि दिमाग की परेशानी मामूली रही, तो रोग भी मामूली ही हालत में रहता है। अतः रोग-परीक्षा करते समय दिमाग की तरफ खूब ध्यान रखना चाहिए। दिमाग ज्ञान और चेतना का केन्द्र है। दिमाग की गड़बड़ी के कारण ही ज्ञानेन्द्रियों में भी गड़बड़ी पैदा होती है, अतएव इस रोग में देखने, सुनने, सूँघने, बोलने या छूने में विकार पैदा हो जाता है। किसी-किसी हिस्टीरिया रोग में दृष्टि मारी जाती है, तो किसी में सामने देखने में फर्क मालूम पड़ता है, कोई ऊँचा सुनता है; तो कोई बिलकुल नहीं सुनता, किसी-किसी की बोली बन्द हो जाती, किसी को स्पर्श-ज्ञान का इतना हास हो जाता है कि सुई चुभोने पर भी जल्दी उसे मालूम नहीं देता। इसी प्रकार किसी को सूँघने की शक्ति ही मारी जाती है।
- हिस्टीरिया का प्रधान लक्षण मूर्च्छा या बेहोशी का दौरा है। यह दौरा किसी-किसी को 24 घण्टे से 48 घण्टे तक निरन्तर होते देखा गया है। अनेक रोगियों में निरन्तर और बार-बार जल्दी दौरा होते देखा गया है। ऐसी अवस्था में होश आते ही पुनः दौरा आ जाता है। बेहोशी की हालत में दाँत बैठ जाते, शरीर अकड़ जाता, रोगिणी हाथ-पैर पटकती है, कभी-कभी मृगी रोग की तरह मुंह से फेन भी निकलने लगता है। किन्तु हिस्टीरिया रोग में मृगी की तरह शरीर नीला नहीं होता तथा आँखों की पुतलियाँ फिर नहीं जातीं और न ज्ञान-शक्ति का एकदम लोप ही हो जाता, रोगिणी को भीतरी ज्ञान कुछ-कुछ बना रहता है। इस रोग में स्मृतिसागर रस के उपयोग से अच्छा लाभ होता है।
- नोट: आजकल उन्माद रोग के लिए सर्पगन्धा का विशेष उपयोग किया जाता है और फल भी अच्छा मिलता है। मैंने पटना में ऐसे दो उन्माद रोगियों को सर्पगन्धा से अच्छा किया, जिसको डॉक्टर ने भी जवाब दे दिया था। अतएव, स्मृतिसागर रस के साथ सर्पगन्धा के चूर्ण का भी अवश्य प्रयोग करना चाहिए।
- हिस्टीरिया में यदि पित्त की अधिकता के कारण चक्कर आना, दाह होना, कमजोरी के कारण आँखों के सामने अंधेरा छा जाना आदि लक्षण हों, तो स्वर्णमाक्षिक भस्म और प्रवालपिष्टी के साथ स्मृतिसागर रस मिश्री मिलाकर देने से अच्छा लाभ होता है।
- यदि प्रकुपित कफ और मासिक धर्म की गड़बड़ी के कारण यह रोग हो, तो केवल स्मृतिसागर रस का ही प्रयोग करना चाहिए।
- बच्चों के धनुष्टंकार रोग में भी इस रसायन का उपयोग किया जाता है। इस रोग में बारबार दौरा होता है, दौरे के समय बच्चा बेहोश हो जाता, श्वास की गति धीमी पड़ जाती है, नाड़ी क्षीण, शरीर ठण्डा, वायु के झटके से हाथ-पैर अथवा सम्पूर्ण शरीर चलायमान हो जाना आदि लक्षण होते हैं। इस हालत में ‘स्मृतिसागर रस” के सेवन कराने से लाभ होता है। इससे प्रकृपित वाद शत हो जाता है। बच्चों के लिए यह बहुत भयंकर रोग है। अतः इसमें खूब सावधानी से चिकित्सा करनी चाहिये।
- इसी तरह अधिक शीत लगने, ठण्डी हवा अथवा गीली जगह में सोने, ज्यादे देर तक पानी में भींगने या गीले वस्त्र अधिक देर तक पहनने से वात-प्रकुपित हो शरीर के एकभाग के अंग को विकृत कर देता है। इसमें शरीर में चिनचिनी-सी होना, उस भाग के इन्द्रियांश शिथिल और अकर्मण्य ही जाना, बोलने में भी कष्ट होना आदि उपद्रव होते हैं। ऐसी स्थिति में ‘स्मृतिसागर रस’ के उपयोग से वातवाहिनी नाड़ी की विकृति धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं और रक्त का संचार भी -होने लगता है। फिर क्रमशः हाथ-पाँव आदि में भी ताकत आ जाती है।
- आक्षेप जनित वात रोगों में या संज्ञावाहिनी शक्ति की क्षीणता (ह्रास) होने अथवा मस्तिष्क-संबंधी कोई भी बीमारी हो, तो स्मृतिसागर रस का उपयोग किया जाता है।
- किसी-किसी मनुष्य की स्वस्थ रहते हुए भी स्मरण-शक्ति बिलकुल कम होती है। ऐसे लोगों में कफ-वृद्धि अवश्य रहती है, क्योंकि स्मृति (स्मरण) शक्ति को नाश करने में कफ का सबसे प्रधान हाथ रहता है। कफाधिक्य के कारण चेतनाशक्ति आच्छादित हो जाती, फिर विचारने या किसी चीज को स्मरण करने की शक्ति लुप्त हो जाती है। इस शक्ति को सबल और सचेष्ट बनाने के लिए स्मृतिसागर रस का उपयोग करना लाभदायक है।
This content is for informational purposes only. Always consult a certified medical professional before using any medicines.
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