Sootshekhar Ras ( Swarn Yukat )
सूतशेखर रस नं० 1 (स्वर्ण युक्त )
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation): – शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, सुवर्ण भस्म, रौप्य भस्म, शुद्ध सुहागा, सोंठ, मिर्च, पीपल, शुद्ध धतूरे के बीज, ताम्र भस्म, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, नागकेशर, शंख भस्म, बेलगिरी और कचूर प्रत्येक समभाग लेकर प्रथम पारा-गन्धक की कज्जली बना, शेष दवाओं का कपड़छन चूर्ण मिला, 21 दिन भांगरे के रस में मर्दन कर 2-2 रत्ती की गोलियाँ (बत्ती जैसी) बना, छाया में सुखाकर रख लें।
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan) :- 1-1 गोली सुबह-शाम शहद 1 माशा, गाय का घी 3 माशा, मीठे बेदाने या दाड़िम का रस, दाड़मावलेह या शर्बत अथवा लाजमण्ड के साथ दें।
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :-
- इस रसायन के उपयोग से अम्लपित्त, वमन, संग्रहणी, खाँसी, गुल्म, मन्दाग्नि, पेट फूलना, हिचकी आदि रोग नष्ट होते हैं।
- श्वास तथा राजयक्ष्मा में भी इसका प्रयोग किया जाता है।
- यह रसायन पित्त और वातजन्य विकारों को शान्त करता है। विशेषतया-पित्त की विकृति जैसे अम्लता या तीक्ष्णता या आमाशय अथवा पित्ताशय में पित्त कमजोर हो अपना कार्य करने में असमर्थ हो गया हो, तो उसे सुधारता है। अतएव इसका प्रयोग अम्लपित्त में खट्टा वमन, कोष्ठ में दर्द होना, उदावर्त आदि पित्त-विकृति रोगों में प्रायः अधिक किया जाता है।
- यह पित्तदोषनाशक होते हुए हृदय को बल देने वाला तथा संग्राही (दस्त को बाँधने वाला) भी है।
- इसलिए राजयक्ष्मा की प्रथम और द्वितीयावस्था में तथा संग्रहणी और अतिसार आदि वात प्रधान रोगों में दस्त कम करने तथा हृदय को बल पहुँचाने के लिए इसे देते हैं।
- सूखी खाँसी–जिसमें कफ नहीं निकलता हो और रात में खाँसी का प्रकोप ज्यादा होता हो, तो सूतशेखर रस को सितोपलादि या तालीसादि चूर्ण के साथ उपयोग करने से खाँसी दूर हो जाती है।
- यह पाचक पित्त की विकृति को दूर कर जठराग्नि को प्रदीप्त करता और कोष्ठ में होने वाले दर्द को दूर करता है, क्योंकि यह वेदन-शामक भी है, परन्तु यह अफीम की तरह शीघ्र ही वेदना (दर्द) का शमन नहीं करता, क्योंकि यह अफीम जैसा तीक्ष्ण-वीर्य प्रधान नहीं है। यद्यपि इसका प्रभाव दर्द में धीरे-धीरे होता है, परन्तु स्थायी होता है। यह उपद्रव को शान्त करते हुए मूल रोग को नष्ट करता है।
- जैसे अम्लपित्त में वात-प्रकोप से दर्द होता है और पित्त-प्रकोप के कारण खट्टा वमन होता है, ये लक्षण प्रधानतया देखने में आते हैं। सूतशेखर रस वात-पित्तशामक गुण के कारण उपरोक्त दोनों विकारों को नष्ट करते हुए अम्लपित्त रोग को भी नष्ट कर देता है। इसलिए इसका प्रभाव धीरे-धीरे किन्तु स्थायी होता है।
- सूतशेखर रस का प्रभाव वातवाहिनी और रक्तवाहिनी शिराओं पर भी होता है। रक्त पित्त की गति में वृद्धि हो जाने के कारण हृदय और नाड़ी की गति में वृद्धि हो जाती है, इसको सूतशेखर रस कम कर देता है।
- इस रसायन से रक्तवाहिनी नाड़ी कुछ संकुचित हो जाती है, जिससे बढ़ी हुई रक्त की गति अपने-आप रुक जाती है। रक्त की गति कम होने पर हृदय की गति भी ठीक रूप से चलने लगती है, जिससे हृदय को कुछ शान्ति मिल जाती है; अतएव यह हृद्य है।
- आन्त्रिक सन्निपात में पित्ताधिक्य होने पर सिर में दर्द, अण्ट-सण्ट बोलना, नींद न आना, प्यास, पीलापन लिये जलन के साथ दस्त होना, रक्त की गति में वृद्धि होना, सूखी खाँसी, पेशाब में पीलापन आदि लक्षण होते हैं। ऐसी अवस्था में सूतशेखर रस, प्रवाल चन्द्रपुटी और गिलोय सत्व में मिलाकर देने से पित्त की शान्ति हो जाती तथा बढ़ी हुई रक्त की गति कम हो जाती है। फिर धीरे-धीरे रोगी अच्छा होने लगता है।
- शरीर में वात और पित्त की वृद्धि से रक्त दूषित हो जाने पर रक्त का संचार सीधा न होकर कुछ टेढ़ा-मेढ़ा होने लगता है। यह संचार माथे की तरफ ज्यादा होता है। जिससे सिर में चक्कर आने लगता है, रोगी को मालूम होता है कि समस्त संसार घूम रहा है। रोगी बैठा हुआ रहे तो भी उसे मालूम होता है कि वह चल रहा है या ऊपर-नीचे आ-जा रहा है। इसमें आँखें बन्द हो जाती हैं, माथा शून्य होता और कानों में सनसनाहट होने लगती है, हृदय की गति शिथिल हो जाती, रोगी कभी-कभी घबराने भी लगता है। ऐसी अवस्था में सूतशेखर रस शंखपुष्पी चूर्ण 1 माशा और यवासा चूर्ण 1 माशा के साथ मिश्री मिला, गो-दुग्ध या ठण्डे जल के साथ देने से बहुत शीघ्र लाभ होता है।
- आक्षेप जन्य वायु रोग जैसे धनुष्टकार, अपतन्त्रक (हिस्टीरिया), अपतानक, धनुर्वात आदि रोगों में भी इसका उपयोग होता है, परन्तु ये रोग वात-पित्तात्मक होने चाहिए।
- कभी-कभी स्त्रियों को बच्चा पैदा होने के बाद अथवा मासिक धर्म खुल कर न होने या दर्द के साथ होने पर चक्कर आने लगता है। यह चक्कर रह-रह कर आता है। इसमें गर्भाशय में दर्द होना, कोष में दर्द होना, घबराहट और कमजोरी बढ़ते जाना, थोड़ा-थोड़ा वनन होना, बेचैनी, वमन होने के बाद पेट में दर्द होना आदि लक्षण होते हैं। ऐसी हालत में सूतशेखर रस के उपयोग से वातजन्य आक्षेप तथा पित्तज दोष शान्त हो जाते हैं।
- वातज सिर-दर्द में सिर में कील ठोंकने के समान पीड़ा होने से रोगी का व्याकुल हो जाना, सम्पूर्ण माथे में दर्द होना, दर्द के मारे रोगी का पागल-सा हो जाना, रोना, चिल्लाना आदि लक्षण होते हैं और पित्तज सिर दर्द में-सिर में जलन के साथ दर्द होना, कफ और मुंह सूखना, वमन होना आदि लक्षण होते हैं। इसमें सूतशेखर रस बहुत फायदा करता है।
- आमाशय की श्लैष्मिक कला में सूजन के साथ छोटे-छोटे पतले व्रण हो जाते हैं, फिर इसमें कड़े अन्न का संयोग होने से दर्द होने लगता है और वह अन्न वहाँ पर रह कर सड़ने लगता है और जब वमन के साथ वह अन्न निकल जाता है तब कुछ शान्ति मिलती है-ऐसी अवस्था में सूतशेखर रस देने से आमाशय के व्रण का रोपण हो जाता तथा पित्त का स्त्राव भी नियमित रूप से होने लगता और अपचन आदि विकारों के नष्ट होने से दर्द भी नहीं होता है।
This content is for informational purposes only. Always consult a certified medical professional before using any medicines.
Book Your Online Consultation