Harishankar Ras
हरिशंकर रस
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation): – पारद भस्म (रससिन्दूर) तथा अभ्रक भस्म दोनों समान भाग लेकर एक सप्ताह तक आँवला और हल्दी-स्वरस में घोंटकर 1-1 रत्ती की गोलियाँ बना, सुखाकर शीशी में सुरक्षित रख लें।
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan) :- 1-2 रत्ती सुबह-शाम, 5 तोला चावल के पानी में 1 से 3 माशे तक बकायन के बीज को पीसकर 6 माशा घी मिलाकर इसके साथ दें।
वक्तव्य: मूल ग्रंथ पाठ में इसकी मात्रा 1 माशा की लिखी है, परन्तु इस योग में रससिन्दूर और अभ्रक भस्म ये ही दो द्रव्य हैं, जो कि दोनों ही 1 रत्ती से 3 रत्ती तक की मात्रा में प्रयोग किये जाते हैं, अतः वर्तमान काल के अल्प सत्व मनुष्यों के लिये 1 से 3 रत्ती की मात्रा उचित है।
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :-
- पूय प्रमेह (सूजाक) में यह विशेष फायदा करती है, पेशाब में जलन होना, पेशाब से खून आना अथवा पीब निकलना तथा बस्ति-प्रदेश में जलन आदि होना इन्हें दूर करता हैं।
- प्रमेह रोग के लिये भी यह बहुत उत्त रसायन है।
- इसके सेवन से वातवाहिनियों तथा रक्तवाहिनियों पर भी बड़ा उत्तम प्रभाव होता है।
- अतः सभी प्रकार के वात रोगों में इसके सेवन से उत्तम लाभ होता है।
- कफजन्य विकार भी नष्ट करता है।
- स्नायु मण्डल तथा मस्तिष्क की शक्ति बढ़ाता है।
This content is for informational purposes only. Always consult a certified medical professional before using any medicines.
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