Vatkulantak Ras
वातकुलान्तक रस
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation) – कस्तूरी, शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, नागकेशर, शुद्ध मैनशिल, बहेड़ा, जायफल, छोटी इलायची-बीज और लौंग–प्रत्येक 1-1 तोला लें। प्रथम पारा-गन्धक की कज्जली बना, उसमें कस्तूरी डालकर ब्राह्मी के रस में 3 घण्टा मर्दन करें, फिर शेष दवाओं का कपड़छन किया हुआ चूर्ण मिला, ब्राह्मी के रस में एक दिन मर्दन करके 1-1 रती की गोलियाँ बना, सुखा कर रख लें।
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan)– 1-1 गोली दिन में तीन-चार बार, ब्राह्मी, शंखपुष्पी, लौंग और जटामांसी-क्वाथ के साथ दें।
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :
- यह रसायन-अपस्मार, मूर्च्छा (बेहोशी), हिस्टीरिया, आक्षेपक, अपतानक, दण्डापतानक, धनुर्वात, पक्षाधात आदि वात रोग और सूतिकारोग-जन्य वातरोग आदि को नष्ट करता तथा मन को प्रसन्न करता और सन्निपात ज्वर में उपद्रव रूप से उत्पन्न प्रलाप (अक-बक करना), चित्तविभ्रम आदि उपद्रवों को दूरकर अच्छी नींद लाता है।
- वातरोगों तथा मानसिक एवं मस्तिष्क सम्बन्धी रोगों में उत्तम और शीघ्र लाभकारी महौषधि है।
- इस रसायन का सबसे अधिक प्रभाव मस्तिष्क और वातवाहिनी नाड़ियों पर होता है। अतएव मानसिक आघात से उत्पन्न होने वाले रोगों में इसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है।
- इसी तरह आक्षेपजन्य विकारों में अर्थात् वातवाहिनी नाड़ियों की विकृति से रक्त का संचार ठीकठीक नहीं होने से शिराओं में खिंचावट पैदा होने लगती है, तब धनुर्वात आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में वातकुलान्तक रस के उपयोग से ये सब दोष नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि यह वातवाहिनी नाड़ियों की विकृति को दूर करता है, जिससे रक्त का संचार ठीक तरह होने लग जाता है।
- इस रसायन में पारद जैसे योगवाही द्रव्य और कस्तूरी जैसे व्यवायी और विकाशी, तीक्ष्ण एवं उष्णवीर्य और उग्र प्रभावशाली द्रव्य के संयोग से इसके गुणों में बहुत वृद्धि हो जाती है।
This content is for informational purposes only. Always consult a certified medical professional before using any medicines.
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