Ras Aushadhi Parkaran – Introduction
रस-रसायन-औषधि प्रकरण
- इस प्रकरण में पारा, गन्धक और सिंगरफ(हिंगुल) आदि रस-उपरसों, धातु-उपघातुओं की भस्मों, विष-उपविषों, प्राणिज द्रव्यों, काष्ठौषधियों एवं वनस्पतियों आदि के योग से बनी हुई दवाओं की निर्माण-विधि तथा उनके गुण-धमाँ का वर्णन किया जायेगा। परन्तु वर्णन करने से पूर्व कुछ बातें ऐसी हैं, जिनके विषय में जानकारी प्राप्त करा देना अच्छा है।
- रस पारा का नाम है अतः पारद और पारद के खनिज सिंगरफ(हिंगुल) तथा गन्धक आदि के संयोग से जितनी दवाइयाँ बनती हैं, वे चाहे चूर्ण रूप में हों या गोली रूप में, सब रस संज्ञक हैं। अर्थात् उनकी गणना रस-रसायन औषधि के अन्दर होती है।
- जिन दवाओं में पारा-गन्धक के साथ अन्य धातुओं (भस्मों) या काष्ठादि औषधियों का सम्मिश्रण करना हो, उनमें सर्वप्रथम पारा और गन्धक डालकर खूब घोंट कर कज्जली बनावें।
- कञ्जली की घोंटाई जितनी अधिक होगी, दवा उतनी ही अधिक गुणकारी होगी। कज्जली जब सुर्मा की तरह महीन तथा चन्द्रिकारहित और चिकनी हो जाय तब उसमें दूसरी दवा मिलाकर पुनः घोंटें।
- पारा, गन्धक-विष (बच्छनाग), हिंगुल (सिंगरफ), टंकण (सुहागा), फिटकरी, कुचला, अफीम, भाँग, धतूरा बीज, जयपाल, मैनशिल, हरताल आदि दवाइयाँ उपरोक्त विधि से शुद्ध करके ही दवा में डालनी चाहिए।
- ये अशुद्ध डालने से लाभ की जगह नुकसान करती हैं।
- जहाँ अन्य समस्त औषधियाँ निष्प्रयोजन सिद्ध होती हैं, वहाँ रस-रसायन अपने अनन्य प्रभाव से बहुत उत्तम लाभ करके सबको आश्चर्य में डाल देते हैं।
- इनके सेवन से वृद्धावस्था तक का निरोध होता है।
- रोगों का नाश हो, शरीर में परिशुद्ध रस-रक्तादि का संचार होता तथा शरीर स्वस्थ एवं हष्ट-पुष्ट हो जाता है।
- पारद के योगवाही एवं अल्पमात्रोपयोगी होने के कारण उसके साथ मिश्रित किये गये द्रव्यों के गुणों को वह अपनी विलक्षण शक्ति के प्रभाव से अत्यन्त बढ़ा देता है। अतएव आयुर्वेदीय रस-रसायनों का चिकित्सा-जगत में अतीव महत्वपूर्ण स्थान है। जहाँ इंजेक्शन जैसी आशुफलकारी औषधियाँ एवं सल्फाडूग्ज जैसी तीव्र औषधियाँ भी असफल हो जाती हैं और असाध्य समझ कर त्यागे हुए कितने ही कठिन रोगों से हि को भी आयुर्वेदीय रस-रसायनों के सेवन से पूर्ण स्वास्थ्य-लाभ प्राप्त करते देखा जाता है।
- रसों के समान गुणकारी, हानिरहित अन्य दवा मिलना कठिन है। परन्तु वे सब गुण तभी प्राप्त हो सकते हैं, जब रस-रसायन शास्त्रोक्त रीति से तैयार किये गये हों अन्यथा लाभ के स्थान में हानि भी-हो सकती है।
- इसके अतिरिक्त रसों में जो धातु, उपधातु, रत्न, उपरत्म, रस, उपरस, विष, उपविष आदि व्यवहत होते हैं, उन्हें भी विधिवत् शोधन मारण करके ही प्रयोग में लेना चाहिए। यदि कहीं किसी औषध-विधान में शोधन करने की स्पष्ट आज्ञा नहीं दी गयी हो, तो भी इन द्रव्यों को शोधन करने के बाद ही दवा में डालना चाहिए, यह सामान्य नियम है।