Piyush Sindhu Ras
पीयूष सिन्धु रस
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation) – समान भाग पारा-गन्धक की कज्जली बना, बालुकायन्त्र में पाक करें। इस प्रकार 6 बार पाक करके 6 गुना गन्धक जारण करके रस-सिन्दूर बनावें। इस प्रकार षड्गुण बलिजारित रससिन्दूर 1 तोला, स्वर्ण भस्म, लौह भस्म, अभ्रक भस्म, शुद्ध गन्धक–प्रत्येक 1-1 तोला मिलाकर सूरणकन्द, दन्तीमूल, गोरखमुण्डी, मकोय, कलिहारी, भाँगरा, आक, चित्रकमूल-इनके स्वरस या क्वाथ से क्रमशः सात-सात बार भावना देकर मर्दन करें। गोला बनाने योग्य होने पर इसका गोला बना, एरण्ड के पत्तों में लपेट कर तीन दिन तक धान के ढेर में दबा रखें। तीन दिन पश्चात् निकाल कर गोले को सूक्ष्म मर्दन कर सुरक्षित रखें।
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan)– 1 से 2 रत्ती तक, मधु या रोगानुसार अनुपात के साथ आवश्यकतानुसार दिन में 2 बार दें।
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :
- इस रसायनं का प्रयोग करने से भयंकर अर्श रोग, ग्रहणी रोग, शूलरोग, पाण्डु रोग, अम्लपित्त, क्षय रोग–इनको शीघ्र नष्ट करता है।
- 6 मास तक इस रसायन का सेवन करने से वृद्धावस्था (बुढ़ापा) नहीं रहता।
- इसके सेवन से कान्ति और वीर्य की वृद्धि होती है, यह अत्यन्त पुष्टिकारक है।
- इसके सेवन काल में खटाई, तैल और स्री-प्रसङ्ग से परहेज करना विशेष लाभदायक है।
This content is for informational purposes only. Always consult a certified medical professional before using any medicines.
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