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    Post Views: 403 पंचसकार चूर्ण (विरेचक) मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि :  सनाय की पत्ती ४ भाग, सोंठ, सौंफ, सेन्धा नमक १-१ भाग और शिवा (घी या एरण्ड तैल में लगाकर सेंकी हुई जौ-हरड़) २ भाग लेकर कूट-कपड़छन कर चूर्ण बनावें। –सि. यो. सं. मात्रा और अनुपान– २३ से ६ माशे तक अकेला या इसमें…

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    Post Views: 316 बाकचिकाद्य चूर्ण गुण और उपयोग — यह चूर्ण रक्तशो धक, विरेचक आर कृष्ठघ्न है। इसके सेवन से रफ्त-विकार, कष्ट, वातरक्त, शरीर पर होने वाली छोटी-छोटी फंसियाँ आदि विकार नप्ट हा जात है। मात्रा और अनुपान–२ से४ माशा तक गुर्च (गिलोय ) के क्वाथ या जल के साथ दें। मुख्य सामग्री तथा बनाने…

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    Post Views: 255 द्राक्षादि चूर्ण मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि:  मुनक्का, धान की खील, श्‍वेत-कमल, मुलेठी, खजूर (गुठली निकाला हुआ), अनन्तमूल, बंशलोचन, खस, आँवला, मोथा, सफेद चन्दन, तगर, कंकोल (कबाबचीनी), जायफल, दालचीनी, तेजपात, छोटी इलायची, नागकेशर, पीपल, धनियाँ -प्रत्येक चीज समान भाग लेकर चूर्ण करें तथा सबके बराबर चीनी (मिश्री) पीसकर मिला द लें। र…

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    Post Views: 223 दाडिमाष्टक चूर्ण मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि:  अनारदाना १ सेर, भुनी हींग ३ माशे २ रत्ती, सेन्धानमक १ पाव, कालीमिचं १ पाव, जीरा सफेद भुना हुआ १ पाव, बड़ी इलायची के बीज १ छटाँक, मिश्री १ पाव, निंबू सत्व २।। तोला लेकर हींग को छोडकर सब द्रव्यों को एकत्र मिलाकर कूट कर सूक्ष्म…

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    Post Views: 327 लघुमाई चूर्ण गुण और उपयोग (Uses and Benifits )—— इस चूर्ण क सेवन से आमशूल आमातिसार और विशेषत रक्‍तातिसार नष्ट होता है। रक्‍तातिसार में इस चर्ण क उपयोग से शीघ्र लाभ होता है । सामान्यतः सभी अतिसारों में यह अच्छा लाभ करता है। मात्रा और अनुपान  (Dose and Anupan) —४ रत्ती(500 mg)…