Kumudehwar Ras
कुमुदेश्वर रस
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation) – स्वर्ण भस्म, रससिन्दूर, शुद्ध गन्धक, मोती भस्म या पिष्टी, शुद्ध पारद, शुद्ध टंकण, चाँदी भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म–ये प्रत्येक – तोला लेकर एकत्र मिला, खरल में डाल कर काँजी के साथ मर्दन करके एक गोला-सा बना लें। इस गोले को मिट्टी के दो शराबों में बन्द करके सन्धिबन्धन कर कपड़मिट्टी करके सुखा लें। पश्चात् लवण-यन्त्र में रख कर दिन भर चूल्हे पर रख कर पाक करें अथवा मृदु पुट में रख कर पकावें। स्वांग-शीतल होने पर सूक्ष्म मर्दन कर सुरक्षित रखें। —र. सा. सं.
वक्तव्य : इस योग से र. चं. और र. यो. सा. की अपेक्षा र. सा. सं. के पाठ में अन्तर है। र. चं. और र. यो. सा. में स्वर्ण भस्म, रससिन्दूर 7- भाग, मोती भस्म 2 भाग, रससिन्दूर से चतुर्थाश टंकण और शुद्ध गन्धक सब के बराबर लेने को लिखा है, तथा रौप्य भस्म और स्वर्णमाक्षिक भस्म का पाठ नहीं है तथा र. सा. सं. पाठ मैं स्वर्ण भस्म, रससिन्दूर, शुद्ध गन्धक, मोती भस्म, रौप्य भस्म, स्वर्णमाक्षिक भस्म–ये प्रत्येक द्रव्य – भाग लेने का उल्लेख है एवं शुद्ध टंकण रससिन्दूर से चतुथाँश लेने का उल्लेख है। किन्तु कोई-कोई चिकित्सक इस योग के र. सा. सं. के पाठ में भी मतभेद मान कर टंकण सहित सब द्रव्य समभाग लेते हैं और ‘रस’ इस शब्द से शुद्ध पारद लेते हैं एवं कोई-कोई रस इस शब्द से खर्पर भस्म लेने का भी विधान करते हैं। हमारी राय में र. सा. सं. वाला योग ठीक है। हम ‘रस’ इस शब्द से पारद लेते हैं और सभी द्रव्य टंकण सहित समान भाग लेते हैं।
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan)– 1-1 रत्ती काली मिर्च चूर्ण और घी के साथ या मधु के साथ अथवा रोगानुसार उचित अनुपान के साथ दें।
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :-
- स्वर्ण, मोती, रससिन्दूर आदि उतकृष्ट बहुमूल्य उपादानों से निर्मित इस रसायन का प्रयोग करने से समस्त प्रकार के राजयक्ष्मा रोग शीध्र नष्ट होते हैं।
- विशेषतः राजयक्ष्मा की प्रथमावस्था में इसके प्रयोग से बहुत अच्छा लाभ होता है।
- इसके अतिरिक्त पुराने जीर्ण ज्वर, पुरानी खाँसी और श्वास तथा इनसे होनेवाले उपद्रव, प्रबल ज्वर, पर्श्वशूल, हृदय की धड़कन, हृदय की दुर्बलता, निद्रानाश, उदरवायु की प्रबलता आदि लक्षणों में अच्छा लाभ होता है।
- यह रसायन सौम्य होने के कारण इसका हृदय पर बहुत अच्छा प्रभाव होता है।
- दिमाग तथा वात नाड़ियों को बल प्रदान करता है।
- रस-रक्तादि सातों धातुओं की वृद्धि कर बल, वर्ण, कान्ति तथा ओज की वृद्धि करता है।
This content is for informational purposes only. Always consult a certified medical professional before using any medicines.
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