Ardhnarinateshwar Ras
अर्द्धनारीनटेश्वर रस
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation) – शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक प्रत्येक 1-1 तोला, शुद्ध विष 2 तोला, शुद्ध जमालगोटा 2 तोला और काली मिर्च का चूर्ण 4 तोला लें। पहले पारा गन्धक की कज्जली बनावें फिर शेष औषधियों को भी मिलाकर त्रिफला के काढ़े से मर्दन करें तथा 5 भावनाएँ उसी (त्रिफले के काढ़े) की देकर छाया में शुष्क करके रख लें। सा. सं.
वक्तव्य : यह योग रसेन्द्र सारसंग्रह और रस चण्डांशु में है। मूलपाठ दोनों में समान है। रसे० सा० सं० के टीकाकार आचार्य घनानन्द जी पन्त के मतानुसार मरिच का परिमाण पार और गन्धक दोनों से चौगुना लेना चाहिये तथा रस चण्डांशु के टीकाकार वैद्य दत्ता बल्लाल बोरकर के मतानुसार सिर्फ पारद से चौगुना लेना चाहिये। रस योग सागरकार ने पारद से चौगुना लिखा है, अतः यही हमने भी ठीक माना है। मात्रा और अनुपान
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan)– 1 से 2 रत्ती तक जम्बीरी नींबू के रस में घिसकर जिस भाग में ज्वर हो अथवा जिस भाग का ज्वर उतारना हो उस भाग में नस्य दें।
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :-
- यह सन्निपात, तन्द्रा, निद्रा न आना, सिर दर्द, कास, श्वास, मूर्च्छा, कफ की प्रबलता आदि में नस्य देने से शीघ्र लाभ होता है।“रत्नाकर औषध योग” में लिखा है कि बकरी के एक थन से दूध निकाल कर उस दूध से इसका नस्य दिया जाय, तो जिस भाग के स्तन का दूध होगा शरीर के उसी आधे अंग का ज्वर उतर जायेगा।
- यदि समस्त शरीर से ज्वर उतारना हो तो इसे अदरक रस के साथ नस्य दें।
- ‘रसेन्द्रसार संग्रह” में लिखा है कि केवल इस रस को एक ओर की नाक-चिद्र में नस्य दें, तो शरीर के उस (आधे) भाग का ज्वर दूर हो जाता है। आधा ज्वर उतर जाने पर नासिका के दूसरे छिद्र में नस्य दें, तो शेष (आधा) भी ज्वर उतर जाता है
- इसका प्रयोग विषमज्वर में ही अधिकतर करना चाहिए।
- सन्निपात में यदि प्रयोग करना हो, तो मात्रा दूनी कर देने से लाभ होता है। परन्तु, नस्य अदरक के स्वरस में मिलाकर दें।
- रसों की शक्ति अचिन्त्य है। इनकी शक्ति की विवेचना नहीं की जा सकती है। कुछ रस -ऐसे भी हैं जो अपनी अलौकिक शक्ति द्वारा एक विचित्र प्रभाव दिखा कर बड़े-बड़े विद्वानों को मोह में डाल देते हैं।
- इस रस में इतनी अलौकिक शक्ति है कि शरीर में बढ़ी हुई ज्वर की गर्मी को खींच कर वह स्वाभाविक स्थिति पर ला देता है।
- इसका प्रभाव खास कर उन केन्द्रों में होता है, जहाँ शरीर की प्राकृतिक गर्मी को बढ़ाकर सम्पूर्ण शरीर में फैला दिया जाता है, अतः यह नस्यमात्र से ही ज्वर की गर्मी को दूर कर देता है।
- स्वामी हरिशरणानन्द जी लिखते हैं कि, “कुछ रसों में ऐसी भी शक्ति है जो मस्तिष्क के उत्तापोत्पादक केन्द्र के विचलन को ठीक कर देती है। इससे शरीर के उत्ताप की मात्रा नार्मल हो जाती है। हो सकता है कि इसका यही प्रभाव उक्त केन्द्र पर होता हो।” इस कार्य में यह सुप्रसिद्ध योग है। इसके इस विलक्षण प्रभाव के प्रत्यक्ष चमत्कार की कई घटनाएँ वृद्ध वैद्यो से सुनी गई हैं।