Yakritari Loh
यकृदरि लौह
गुण और उपयोग (Uses and Benefits) :-
- यकृत् रोग नाश करने की यह प्रसिद्ध दवा है।
- यकृत् में किसी तरह की बीमारी होने से पाचक रस उचित मात्रा में नहीं बन पाता, अतः अन्नादि का पाचन ठीक से नहीं होता है,जिसके कारण रस-रक्त-वीर्यं आदि शरीर को पुष्ट करने वाले सातों धातुओं की उचित परिमाण मे पूर्ति नहीं हो पाती-पश्चात् शरीर सूखने लगता है, हाथ-पाँव पतले हो जाते हैं, पेट आगे निकल आता है, बराबर थोड़ा-बहुत बुखार आता है और शरीर पीला पड़ जाता है, एवं हाथ-पैर, मुंह, नेत्र और पेट पर सूजन भी हो जाती है। ऐसी अवस्था में यकृदरि लौह अमृत के समान गुण करता है।
- इसका प्रभाव सर्वप्रथम यकृत् की पाचक रस उत्पन्न करने वाली ग्रन्थि (पेक्रियाज) पर होता हे, जिससे पाचक रस तैयार होने लगता है और रक्त उचित मात्रा में बनकर शरीर पुष्ट और नीरोग हो जाता है।
- इसमें ताम्र भस्म का योग होने के कारण यह यकृत् की क्रिया को उत्तेजित कर पाचक रस अधिक बनाने एवं रस धातु के परिपाक द्वारा रक्तादि उत्तरोत्तर धातुओं के निर्माण का श्रेष्ठ कार्य करता है।
मात्रा और अनुपान (Dose and Anupan) :- 1- 1 गोली, सुबह-शाम जल या गो-मूत्र के साथ दें।
मुख्य सामग्री तथा बनाने विधि ( Main Ingredients and Method of Preparation): – लौह भस्म 2 तोला, अभ्रक भस्म 2 तोला, ताम्र भस्म 7 तोला, बिजौरा नीम्बू की जड़ की छाल का चूर्ण 4 तोला, मृग-चर्म भस्म 4 तोला लेकर सबको एकत्र मिला अच्छी तरह मर्दन कर जल के साथ घोंट कर 2-2 रत्ती की गोलियाँ बना, सुखा कर रख लें। भै. र.
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