पथ्यापथ्य(हितकर एवं अहितकर)
पथ्यापथ्य(हितकर एवं अहितकर) पथ्ये सति गदार्तस्य किमौषधनिषेदणैः॥ पथ्येऽसति गदार्तस्य किमौषधनिषेवणैः॥ इसका भाव. यह है कि यदि रोगी पथ्य से रहे, तो उसे औषध सेवन कराने की क्या जरूरत? अर्थात् रोगोत्तर पथ्यापथ्य के विचार से रहने पर ही बहुत से प्रारम्भिक रोग अच्छे हो जाते हें। जैसे साधारण ज्वरादि। इसी तरह यदि रोगी अपथ्य से रहे, तो उसे भी औषध सेवन से क्या लाभ? अर्थात् औषध सेवनकाल में यदि वैद्यो के आदेशानुसार पथ्य-परहेज से नहीं रहे, तो सिर्फ औषध मात्र के सेवन से कया फायदा होगा ? अतः औषध-सेवन-काल में अथवा जब रोग छूट जाय उसके बाद भी वैद्यों के आदेशानुसार अथवा शास्त्र विधानानुसार पथ्य 'करने से शीघ्र ही शरीर निरोग हो जाता है। इसी का विवेचन इस प्रकरण में किया जायेगा। पथ्याहार पुराने चावल का भात या पुराने जौ का दलिया अथवा सत्त, पुराने धान की खील (लावा) या मकई, ज्वार (जनेर) की खील (लावा) का आटा, मूँग की दाल, पुरानी, अरहर की पतली दाल, साबूदाना या दूध में बनी हुई पतली खीर या लस्सी-ये सुपच आहार हैं।
पानी (पानी पीने का सही तरीका आज हम आपको पानी पीने के सही तरीके और सही समय के बारे में बताएंगे) धातु के कलईदार या मिट्टी के बर्तन में खूब उबाल कर ठंडा किया हुआ पानी सन्निपात ज्वर, अग्निमान्द्य, पेट के. रोग, उल्टी (वमन), आमांश, पार्श्वशूल, कटिशूल, जुकाम, वातरोग, गलग्रह, नवज्वर, हिक्का, दाह या जो स्नेह-पान किया हो इत्यादि रोगों में सुबह से शाम तक पीना और शाम को उबाल कर ठंडा किया हुआ पानी रात भर पीना चाहिए। एक बार गरम किये हुए पानी को दुबारा नहीं उबालना चाहिए। भोजन करते समय थोड़ा-थोड़ा पानी बार-बार पीना चाहिए। एक ही बार में ज्यादा पानी नहीं पीना चाहिए। दूध पीने के बाद आधा घंटा तक पानी नहीं पीना चाहिए। पेटशूल और नलाश्रितवायु तथा अम्लपित्त के रोगियों को भोजन के समय पानी के स्थान में दूध पीना चाहिए। फिर छः घंटे के बाद यदि प्यास लगे, तो मात्र 20 तोला पानी पीवें, ज्यादा नहीं। अरोचक, जुकाम, सूजन, क्षय, उदर रोग, अग्निमान्द्य, जीर्णज्चर, नेत्ररोग, कुष्ठ और मधुमेह के विकारों में पानी बार-बार परन्तु थोड़ा-थोड़ा पीना चाहिए। मधुमेह और अहुमूत्र रोग में पानी की अपेक्षा दूध ज्यादा लाभदायक है।
सौम्य मसाला : धनियाँ, जीरा, सौंफ (बड़ी), तेजपत्ता (पत्रज) आदि को एकत्र कूट कर रख लें। यह मसाला कफ, खाँसी, दमा, मुँह आना, बवासीर में खून गिरना, दाह होना, रक्त प्रदर, नेत्ररोग, उपदंश (आतशक), प्रमेह, सुजाक और क्षय रोगों में हितकारी है। फलवाले शाक परवल, भिण्डी, तुरई, कच्चा केला, ककोड़ा (खेखसा), पेठा, लौकी, कुँदरु, केले का फूल, काली बैंगन आदि ये शाक पथ्य हैं। कन्दवाले शाक सूरण (जमीकन्द), मूली, गाजर, शकरकन्द, पानी का आलू इन्हें भूनकर या उबाल कर भरता या भाजी बनाकर सेवन करना चाहिए। पत्तेवाले शाक बथुआ, चौलाई, सोआ, मेथी, पुनर्नवा और गोभी के पत्ते, पालक, लोबिया आदि का शाक खाना चाहिए। फल मीठा अनार, संतरा, अंगूर, सेव, अनन्नास, मौसम्बी, फालसा, खिरनी, कागजी नींबू, रसभरी, शरीफा (सीताफल), आम के मौसम में बीजू आम आदि खाने चाहिए।
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